कृषि विकास में ग्रामीण बैंको के योगदान का अध्ययन

Authors

  • रश्मि पाराशर , डॉ. बी. के. अग्रवाल

DOI:

https://doi.org/10.25215/8198963324.17

Abstract

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ आज भी लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। कृषि न केवल देश की खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति करती है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। परंतु लंबे समय तक किसानों को उचित वित्तीय सहायता और बैंकिंग सुविधाओं की कमी के कारण कृषि विकास की गति अपेक्षित नहीं रही। इसी पृष्ठभूमि में ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई ताकि वे ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक उत्थान, विशेषकर कृषि क्षेत्र के विकास में, महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें। ग्रामीण बैंक किसानों, ग्रामीण कारीगरों, लघु उद्यमियों तथा कृषि से जुड़े व्यवसायों को वित्तीय सहायता देकर न केवल उत्पादन में वृद्धि करते हैं, बल्कि ग्रामीण समाज की आर्थिक स्थिरता को भी सुदृढ़ करते हैं। कृषि विकास के क्षेत्र में ग्रामीण बैंकों का योगदान बहुआयामी रहा है। सबसे पहले, उन्होंने किसानों को कृषि ऋण उपलब्ध कराकर उत्पादन के लिए आवश्यक पूंजी की समस्या का समाधान किया। कृषि एक पूंजी-सघन (Capital Intensive) गतिविधि है जिसमें बीज, खाद, सिंचाई, उपकरण, और श्रम जैसी आवश्यकताओं के लिए धन की जरूरत होती है। ग्रामीण बैंक इस दिशा में लघु और दीर्घकालिक ऋण प्रदान करते हैं, जिससे किसान न केवल फसल उत्पादन में निवेश कर पाते हैं बल्कि कृषि से जुड़े अन्य कार्यों जैसे डेयरी, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, बागवानी आदि में भी पूंजी लगा पाते हैं।

Published

2025-10-15