कृत्रिम बुद्धिः एक कदम और आगे

Authors

  • डॉ॰ बोबिन्द्र, सहायक आचार्य

DOI:

https://doi.org/10.25215/9392917538.25

Abstract

कृत्रिम बुद्धि की अवधारणा को सर्वप्रथम पहली बार 20वीं सदी की शुरुआत में द विजार्ड ऑफ ओज फिल्म में द टिन मैन के किरदार के जरिए दर्शाया गया था। 1950 के दशक में वैज्ञानिकों और प्रोग्रामरों ने कृत्रिम बुद्धि की अवधारणा पर काम करना शुरु किया। एलन टयूरिंग, जो एआई के संस्थापक सदस्यों में से एक थे, ने मशीनों की बुद्धिमत्ता की जॉंच के लिए टयूरिंग टेस्ट विकसित किया। सन 1956 में डार्टमाउथ सम्मेलन आयोजित किया गया था और जॉन मैकार्थी ने सर्वप्रथम कृत्रिम बुद्धि शब्द का प्रयोग करके पुरी दुनिया को हतप्रभ कर दिया था। जिस तरह चार्ल्स बैबेज को कम्पयूटर का जनक माना जाता हैं, उसी तरह जॉन मैकार्थी को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अर्थात कृत्रिम बुद्धि का जनक कहा जाता हैं। उन्होनें दुनिया को बतलाया कि मानव मस्तिष्क या मानव बुद्धि के अलावा भी कुछ कार्य कृत्रिम बुद्धि द्धारा कम समय व कम खर्चे में किया जा सकता हैं। तब से लेकर अब तक एआई के क्षेत्र में बहुत काम हुआ हैं, जिसमे मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, कम्पयूटर पिजन और डेटा साइंस सम्मिलित हैं। जोसेफ वीजेनबम ने 1966 में पहला चैटबॉट बनाया था, जिसका नाम एलिजा रखा गया था। पहला बुद्धिमान मानव रोबोट जापान में विकसित किया गया था जिसका नाम NABOT-1 रखा गया था। कहनें का मतलब हैं कि मानव जीवन का कोई भी क्षेत्र एआई से अछूता नहीं रहा हैं। जो बात पहले मात्र कल्पना प्रतीत होती थी, वह बात आज एआई से वास्तविक सिद्ध कर दी हैं।

Published

2024-10-15