कुम्भ आयोजन इतिहास के परिपेक्ष्य मे: एक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.25215/9389476941.26Abstract
13 जनवरी 2025 से प्रारंभ हुआ आस्था, एकता, समरसता का महासमागम प्रयागराज महाकुंभ, 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों का साक्षी बना है। इन 45 दिनों में मानो पूरा विश्व संगम तट पर सिमट गया। 73 देश की प्रतिनिधियों, साधु-संतो, श्रद्धालुओं एवं पर्यटको ने जहां, महाकुंभ की भव्य व्यवस्था को सराहा, वही राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने महाकुंभ- प्रबंधन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। त्रिवेणी तट पर सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक हर पहलू पर नई लकीरें भी खींची गई। "वसुधैव कुटुंबकम" का संदेश देते हुए विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक समागम, महाशिवरात्रि के अंतिम स्नान के साथ संपन्न हो गया। महाकुम्भकी इस परम्परा से, हज़ारों वर्षो से भारत की राष्ट्रीय चेतना को बल मिलता रहा है। हर पूर्ण कुम्भ मे समाज की उस समय की परस्थितियों पर ऋषियों-मुनियों, विद्वत जनो द्वारा 45 दिनों तक मंथन होता था। उक्त शोधपत्र के माध्यम से कुम्भ के ऐतिहासिक पक्ष पर विचार व्यक्त करने का प्रयास किया गया है।Published
2025-03-05
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